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लखीमपुर कांड पर बस 6 ट्वीट, चुनाव से पहले माया ने डाले हथियार? क्या है बीएसपी की रणनीति

लखनऊ लखीमपुर खीरी में रविवार को हुई हिंसा में अब तक 9 लोगों की जान जा चुकी है। मंत्री अजय मिश्रा टेनी के बेटे आशीष पर तिकुनिया में प्रदर्...

लखनऊ लखीमपुर खीरी में रविवार को हुई हिंसा में अब तक 9 लोगों की जान जा चुकी है। मंत्री अजय मिश्रा टेनी के बेटे आशीष पर तिकुनिया में प्रदर्शन कर रहे किसानों को गाड़ी से रौंदने का आरोप है। इधर उग्र भीड़ ने चार लोगों की पीट-पीटकर हत्या कर दी। इस मामले में सियासत तेज हो गई। पूरे प्रदेश में राजनीति गरमा गई। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय लोकदल समेत सारे विपक्षी दल सड़कों पर आ गए, सिवाए बीएसपी के। सपा चीफ अखिलेश यादव, आरएलडी के जयंत चौधरी, कांग्रेस की प्रियंका गांधी, प्रगतिशील समाजवादी पार्टी के शिवपाल सिंह यादव, हर कोई इस मामले में ऐक्टिव नजर आया। सभी दलों के कार्यकर्ता सड़कों पर उतर आए लेकिन मायावती ने इस घटना पर सिर्फ 6 ट्वीट किए। सिर्फ ट्वीट और रटे भाषणों से कर लेती हैं इतिश्री यह पहली बार नहीं है कि किसी घटना पर मायावती ने सिर्फ ट्वीट करके ही इतिश्री कर ली हो। वह हर एक मुद्दे पर सिर्फ ट्वीट करके ही रह जाती है न तो वह खुद और न ही बसपा का कोई कार्यकर्ता धरना प्रदर्शन का हिस्सा बनता है। राजनीतिक विश्लेषक रामेश्वर पांडेय ने कहा कि मायावती, बीजेपी से ज्यादा कांग्रेस और सपा को अपना विरोधी मानती हैं। उनके तार कहीं न कहीं बीजेपी से जुड़े हैं। ऐसा इसलिए भी हो सकता है क्योंकि उनके ऊपर आय से अधिक संपत्ति की तलवार लटकती रहती है। 'मायावती को भरोसा, हो सकती हैं किंगमेकर' रामेश्वर पांडेय ने कहा कि बसपा दलित और ब्राह्मण वोट पर काम कर रही हैं। बसपा कल को किंगमेकर की भूमिका में आ सकती हैं। बीजेपी के साथ मिलकर वह पहले भी सरकार चला चुकी हैं। आगे भी वह बीजेपी के साथ मिलकर सरकार चला सकती हैं, इससे उन्हें गुरेज नहीं हैं। 'सड़क पर उतरना मायावती की रणनीति नहीं' मायावती के ट्वीट भी सरकार की उदासीनता पर होते हैं। उनके ट्वीट भी कभी बीजेपी के प्रति बहुत आक्रामक नहीं होते हैं। वैसे भी बसपा की रणनीति कभी भी सड़क पर उतरने की नहीं रही है। कांशीराम भी गांव-गांव घूमकर संगठन बनाते थे लेकिन सड़क पर नहीं उतरते थे। आज भी पार्टी की यही रणनीति है। मायावती को विश्वास है कि उनका वोटबैंक कहीं नहीं जाएगा। ...तो इसलिए सपा और कांग्रेस पर नजरें रहती हैं टेढ़ीं वह सबसे ज्यादा आक्रामक कांग्रेस और सपा को लेकर हैं। सपा उनका दलित-मुस्लिम का वोटबैंक सपा खींच रही है। मायावती मुस्लिम और दलित कॉम्बिनेशन पर पहले भी चली हैं। इस बार वह दलित-ब्राह्मण कॉम्बिनेशन पर चल रही हैं, ऐसे में कांग्रेस से भी उनको खतरा पैदा हो गया है लेकिन बीजेपी को वोटबैंक और बसपा को वोटबैंक खास क्लैश नहीं करता है। 'केंद्रीय जांच एजेंसियों का डर' वहीं राजनीतिक विश्लेषक अशोक पांडेय ने कहा कि राजनीति वोट के लिए होती है। मायावती का अपना वोट बैंक है। मायावती सड़क पर उतर भी जाएं तब भी उनके वोटबैंक पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। मायावती को ऐसी राजनीतिक की जरूरत नहीं है। वह अच्छे से जानती हैं कि सड़क पर उतरने या आक्रामक होने से उन्हें कोई राजनीति लाभ नहीं हो सकता है। इसके अलावा जिस भी नेता ने स्वच्छ राजनीति नहीं की है, वह सब डरे हुए हैं। केंद्रीय जांच एजेंसियों की तलवार ऐसे नेताओं पर लटकी है, मायावती भी उनमें से एक हैं। वह जानती हैं कि अगर वह बीजेपी को लेकर ज्यादा आक्रामक हुईं तो उन्हें नुकसान हो सकता है। 'मोदी पर आक्रामक होना पड़ सकता है भारी' अशोक पांडेय ने कहा कि बीएसपी चीफ को पता है कि बीजेपी और उनका वोट बैंक अलग है। बीजेपी को पिछड़ा और सवर्ण वोट मिलता है। मायावती का अपना दलित वोट बैंक हैं। इस बार वह दलित-ब्राह्मण कॉम्बिनेशन लेकर चल रही हैं। यह सही है कि ब्राह्मण कहीं न कहीं यूपी सरकार से नाराज है लेकिन इसके बावजूद वह मोदी की बुराई नहीं सुन सकता है। '...तो दलित सवर्ण कॉम्बिनेशन पर पड़ेगा असर' अशोक पांडेय ने कहा कि मायावती को पता है कि अगर वह बीजेपी पर आक्रामक हुईं तो उनके दलित-सवर्ण कॉम्बिनेशन पर असर पड़ेगा। वहीं एनबीटी के संपादक सुधीर मिश्र ने कहा कि मायावती इस सोच के साथ चलती हैं कि उन्हें किसी भी पार्टी के साथ गठबंधन करना पड़ सकता है, इसलिए वह कभी भी बहुत ज्यादा आक्रामक नहीं होती हैं।


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