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ब्लड कैंसर वाले ट्रीटमेंट से मिलेगा एड्स का इलाज! अमेरिका में चूहों पर हो चुका प्रयोग

लखनऊ एड्स (AIDS) की घातक बीमारी का सामना कर रहे मरीजों के लिए उम्मीद की एक किरण सामने आई है। के मरीजों के इलाज के लिए प्रयोग में लाई जाने...

लखनऊ एड्स (AIDS) की घातक बीमारी का सामना कर रहे मरीजों के लिए उम्मीद की एक किरण सामने आई है। के मरीजों के इलाज के लिए प्रयोग में लाई जाने वाले के साथ जीन एडिटिंग के साझे इस्तेमाल से एड्स का इलाज संभव है। एक दिसंबर को वर्ल्ड एड्स डे पर हमारे सहयोगी अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया ने लखनऊ के केजीएमयू में एक्सपर्ट डॉक्टर्स से इस बारे में बात की। लखनऊ में KGMU के हिमटॉलजी विभाग के हेड और HIV के एक्सपर्ट प्रफेसर ए के त्रिपाठी ने बताया, 'अमेरिका के वैज्ञानिकों ने छोटे चूहों पर सफलतापूर्वक प्रयोग कर लिया है। अब इसका प्रयोग बाकी जानवरों पर और बाद में इंसानों पर भी किया जाएगा। क्लिनिकल ट्रायल के सफल होने की सूरत में सभी संस्थाओं से मंजूरी के बाद यह इलाज लागू किया जाएगा।' अमेरिका में नैशनल इंस्टिट्यूट ऑन ड्रग्स अब्यूज में चूहों पर प्रयोग से यह बात सामने आई है। प्रफेसर त्रिपाठी ने बताया कि ऑटोलॉगस बोन मैरो ट्रांसप्लांट (ABMT) में ब्लड कैंसर मरीज के शरीर के बोन मैरो में स्वस्थ स्टेम सेल्स को खराब हो चुके स्टेम सेल्स से अलग किया जाता है। इसके बाद स्वस्थ सेल्स को शरीर में ट्रांसफ्यूज किया जाता है। एचआईवी में बोन मैरो से स्टेम सेल्स को बोन मैरो से निकाला जाता है। इसके बाद वायरस को जीन एडिटिंग के जरिए निकाला जाता है। फिर स्टेम सेल्स को वापस ट्रांसफ्यूज किया जाता है। अमेरिका के नैशनल इंस्टिट्यूट ऑफ ड्रग्स अब्यूज में हुए परीक्षण में पहले चूहों को एचआईवी संक्रमित किया गया। इसके बाद उनके बोन मैरो को निकाल लिया गया। इसके बाद CRISPR के नाम से जानी जाने वाली नई जीन टेक्नॉलजी के जरिये वैज्ञानिकों ने स्टेम सेल्स से एचआईवी के डीएनए को हटा दिया। इसके बाद स्वस्थ बोन मैरो को उन चूहों में ट्रांसफ्यूज कर दिया गया। उन्होंने आगे बताया, 'इसके साथ ही चूहे के शरीर में संक्रमित खून को दूसरे चूहे के शरीर से निकले स्वस्थ ब्लड से रिप्लेस कर दिया गया, जिसे कोई संक्रमण नहीं था। टेस्ट के नतीजों में पाया गया कि जिस चूहे पर प्रयोग किया जा रहा था, उसे एचआईवी का संक्रमण नहीं रहा।' KGMU में ट्रांसफ्यूजन मेडिसिन विभाग की हेड प्रफेसर तूलिका चंद्रा ने कहा, 'ऐसे इलाज उपयोगी तो होते हैं लेकिन बहुत महंगे होते हैं। सरकारी अस्पतालों में बोन मैरो का खर्च 5-6 लाख रुपये, जबकि प्राइवेट में 8-10 लाख रुपये आता है। इसके अलावा जीन एडिटिंग का खर्च भी शामिल है।' प्रफेसर ए के त्रिपाठी ने बताया कि एचआईवी शुरू में इम्युन सिस्टम के CD4 सेल्स को अटैक करता है। वैसे तो यह शांत अवस्था में ही रहता है लेकिन कभी भी ट्रिगर होकर इम्युन सेल्स को तबाह करते हुए एड्स का खतरा पैदा कर सकता है। इसलिए यह गंभीर है। उन्होंने बताया, 'फिलहाल एचआईवी पॉजिटिव मरीजों को ऐंटी रेट्रोवायरल थिरेपी दी जाती है, जिससे कि वायरस को रेप्लिकेट होकर इम्युन सेल्स को खराब होने से रोका जा सके। हालांकि यह इलाज पूरी जिंदगी भर लेना पड़ सकता है। ABMT और जीन एडिटिंग साथ मिलकर एचआईवी संक्रमण को पूरी तरह से सही कर सकता है।'


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