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पंजाब के चुनाव में इस बार क्यों खास हो गए हैं मंदिर? कांग्रेस से लेकर अकाली दल में मची होड़

नई दिल्ली पंजाब के चुनाव में इस बार जो एक खास तरह का बदलाव देखा जा रहा है। पंजाब की पॉलिटिक्स पर बारीक नजर रखने वालों को भी यह याद नहीं क...

नई दिल्ली पंजाब के चुनाव में इस बार जो एक खास तरह का बदलाव देखा जा रहा है। पंजाब की पॉलिटिक्स पर बारीक नजर रखने वालों को भी यह याद नहीं कि इससे पहले कभी राज्य में चुनाव के मौके पर मंदिरों को इतनी अहमियत मिली हो। पंजाब का चुनाव मुख्य रूप से सिखों को केंद्रित कर लड़ा जाता रहा है लेकिन इस बार हिन्दू उसके केंद्र में हैं और मंदिर में माथा टेकने की होड़ मची हुई है। पंजाब में इस बदलाव को महसूस करने के लिए वहां के घटनाक्रम पर नजर डालिए:
  • मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी ने पिछले महीने केदारनाथ धाम के दर्शन किए। वह जालंधर स्थित प्रतिष्ठित शक्तिपीठ श्री देवी तालाब मंदिर में भी माथा टेकने जा चुके हैं। भगवान परशुराम तपोस्थली को पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित करने के लिए दस करोड़ रुपये भी जारी किए। परशुराम की माता रेणुका से जुड़े स्थल के विकास लिए भी उन्होंने 75 लाख रुपये देने की बात कही। यह घोषणा भी की कि महाभारत, रामायण, गीता पर शोध कार्य के लिए पंजाबी यूनिवर्सिटी में एक पीठ का गठन किया जाएगा। यह कहना भी नहीं भूले कि वह संस्कृत भाषा सीखेंगे और फिर महाभारत पर पीएचडी करेंगे।
  • शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल हिमाचल प्रदेश के प्रसिद्ध शक्तिपीठ चिंतपूर्णी मंदिर गए। उन्होंने वादा भी किया कि सरकार बनने पर वह दोबारा दर्शन के लिए आएंगे। वह राजस्थान के सालासर में बालाजी मंदिर भी जा चुके हैं। वह माता अंजनी मंदिर भी गए। जालंधर में श्री देवी तालाब मंदिर भी उन्होंने हाजिरी लगाई और फिर पंजाब के ही राजपुरा में भगवान शिव मंदिर में दर्शन किए। इन सारे मंदिरों में दर्शन करते हुए अपने फोटो उन्होंने खुद सोशल मीडिया पर शेयर भी किए। उनकी पार्टी की तरफ से यह बताया भी गया कि एक दर्जन और मंदिरों में दर्शन करने कार्यक्रम बन रहा है।
  • पंजाब के चुनाव में हिस्सा ले रही आम आदमी पार्टी के दिल्ली के सीएम अरविंद कजेरीवाल भी अक्टूबर महीने में जालंधर स्थित देवी तालाब मंदिर गए थे। उन्होंने एक जगराता में भी हिस्सा लिया था। वह अयोध्या भी रामलला के दर्शन करने जा चुके हैं।
क्या है हिंदू वोटों का समीकरण पंजाब के चुनाव में इस बार नेताओं के बीच 'मंदिर परिक्रमा' की जो होड़ दिख रही है, उसकी वजह यह है कि हिंदू वोटर्स में एक खास तरह की बेचैनी दिख रही है। वह नया रास्ता बनाते दिख रहे हैं। इस बात को वहां सभी राजनीतिक दल महसूस कर रहे हैं, इसके मद्देनजर ही वे अपने सियासी समीकरणों को दुरुस्त करने को लेकर फिक्रमंद हैं। दरअसल, पंजाब में हिंदू 38 प्रतिशत हैं लेकिन उनको लेकर दो खासियत कही जाती रही हैं। एक यह कि उसे साइलेंट वोटर माना जाता रहा है दूसरा यह कि वह कट्टरपंथी गोलबंदी के पक्ष में नहीं रहता। इसी के मद्देनजर अकाली दल को उसने कभी पसंद नहीं किया लेकिन बीजेपी के साथ गठबंधन होने की वजह से उसका कुछ हिस्सा जरूर शेयर होता रहा है। कांग्रेस को मिलते हैं अधिक हिंदू वोट अकाली दल-बीजेपी गठबंधन के मुकाबले उसका ज्यादा वोट कांग्रेस को मिलता रहा है। पिछले चुनाव में आम आदमी पार्टी एक वक्त सरकार बनाती इसलिए दिख रही थी कि हिंदू वोटर्स उसके साथ शिफ्ट होता दिख रहा था लेकिन ऐन मौके पर आम आदमी पार्टी का खेल इसलिए बिगड़ गया कि हिंदू वोटर्स के बीच यह बात घर कर गई कि आम आदमी पार्टी की सरकार बनने पर राज्य में कट्टरवादी सोच रखने वाले तबके को ताकत मिल जाएगी। इसके चलते उसने कांग्रेस को वोट कर दिया लेकिन 2022 के चुनाव आते-आते राज्य के जितने भी स्थायी समीकरण थे, वे सब बिगड़ गए हैं। पंजाब में बदल गया है समीकरण राज्य में 25 साल पुराना अकाली-बीजेपी गठबंधन टूट गया है। कैप्टन अमरिंदर सिंह कांग्रेस से अलग हो गए हैं। सिद्धू प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष हो चुके हैं। दलित चेहरा चन्नी सीएम हो गए हैं। अकाली दल बीएसपी के साथ चुनाव लड़ रहा है। कैप्टन अमरिंदर सिंह के नई पार्टी बनाकर बीजेपी के साथ चुनाव लड़ने की बात हो रही हैं। इतने सारे नए खांचों के बीच हिंदू वोटर्स भी अपने लिए नया खांचा तलाशने में जुटा हुआ है। मंदिर परिक्रमा क्यो हुई जरूरी? जो कांग्रेस हिंदू वोटर्स की पहली पसंद हुआ करती थी, उस कांग्रेस में अगर हिंदू वोटर्स पहले जैसी बात नहीं देख रहे हैं तो उसकी वजह भी हैं। पहली बात तो यह कि कैप्टन अमरिंदर सिंह के बाद जब हिंदू सीएम चुनने की बात चली तो कुछ नेताओं ने इसे खारिज करा दिया, यह कहते हुए कि पंजाब में सिख सीएम ही चुनाव जिता पाएगा। इससे भावनात्मक झटका हिंदू वोटर्स को लगा। दूसरा, प्रदेश अध्यक्ष के रूप में नवजोत सिंह सिद्धू धार्मिक मुद्दों को अपनी प्राथमिकता बनाए हुए हैं, हिंदू वोटर्स को लग रहा है कि यह पार्टी कट्टरवादी सोच की ओर बढ़ गई है। चन्नी इस बात को समझ रहे हैं। इसीलिए वह हिंदुओं के विश्वास को बनाए रखने को मंदिरों का सहारा लेने को मजबूर हो गए हैं। अकाली दल के लिए हिंदू वोटर्स का भरोसा जीतना सबसे बड़ी चुनौती बीजेपी से अलग हो जाने के बाद अकाली दल के लिए हिंदू वोटर्स का भरोसा जीतना सबसे बड़ी चुनौती है। अकाली दल में यह यकीन अभी मजबूत नहीं है कि बीजेपी के अलग होने से हिंदू वोटों का जो नुकसान होगा, उसकी भरपाई बीएसपी के साथ आने से दलित वोटों के जरिए हो पाएगी या नहीं? हिंदू वोटों के नुकसान को रोकने के लिए ही अकाली दल चीफ सुखबीर सिंह बादल मंदिर-मंदिर माथा टेक रहे हैं। आम आदमी पार्टी भी 2017 की पुनरावृत्ति नहीं चाहती है। रही बात बीजेपी की, वह कैप्टन अमरिंदर सिंह की 'राष्ट्रवादी' छवि बनाते हुए उनके साथ चुनाव में जाने में अपना फायदा देख रही है।


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