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लखीमपुर कांड के चार दिन में पुलिस ने घटनास्थल को कब्जे तक में नहीं लिया, उठ रहे सवाल

लखनऊ/लखीमपुर लखीमपुर खीरी के तिकुनिया में रविवार को घटी घटना को चार दिन बीत चुके हैं। सरकार ने न्यायिक जांच समिति बनाने की प्रक्रिया शुरू...

लखनऊ/लखीमपुर लखीमपुर खीरी के तिकुनिया में रविवार को घटी घटना को चार दिन बीत चुके हैं। सरकार ने न्यायिक जांच समिति बनाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। इसके पहले एक जांच दल गठित भी कर दिया है। लेकिन अब इस बात की उम्मीद कम ही बची है कि घटना की जगह पर जांच समिति को भौतिक साक्ष्य मिलेंगे। सामान्य तौर पर मौका-ए-वारदात को पुलिस तत्काल अपने कब्जे में ले लेती है। रविवार की घटना के बाद से ही पुलिस ने एक बार भी उस घटनास्थल का मुआयना तक नहीं किया। सोमवार को किसान वहीं पास में शव रखकर धरना प्रदर्शन कर रहे थे। पूरे घटनास्थल पर लगातार आवाजाही बनी रही। जली हुई गाड़ियों की लोग तस्वीर खींच रहे थे। लगातार उनके आस-पास जा रहे थे। यह सब कुछ भौतिक साक्ष्यों के बचे न रहने के लिए काफी था। पूर्व आईपीएस एसआर दारापुरी कहते हैं कि आम तौर पर जहां एक्सिडेंट होते हैं, वहां चालक, उसमें बैठे और अन्य लोगों से जुड़े सामान या कुछ ऐसे ही साक्ष्य मिल जाया करते हैं। लोगों का दावा है कि वहां गोली चली थी। ऐसे में उसके भी भौतिक साक्ष्य मिल सकते थे अगर उसी समय पुलिस ने वारदात की छानबीन से जुड़ा कुछ भी काम किया होता। अब तो यह मुश्किल है कि इसके भौतिक साक्ष्य मिलें। पढ़ें: जानकार मानते हैं कि कम से कम फरेंसिक टीम को तत्काल मुआयना करना चाहिए था। घटना से जुड़े जो भी सबूत होते वे सामने आते। लेकिन इतने दिन में इस दिशा में कोई प्रयास नहीं किया गया। लखीमपुर खीरी के ASP अरुण कुमार सिंह ने कहा कि यह इस तरह का क्राइम नहीं था कि उसे प्रोटेक्ट किया जाता। क्राइम एरिया भी डिस्टर्ब भी हो गया था। फरेंसिक जांच होगी और सीन रीक्रिएशन होगा। बयान और विडियो तक सिमट जाएगी जांच जानकार मानते हैं कि अब पूरी जांच केवल चश्मदीदों के बयान, आरोपियों और पीड़ितों से पूछताछ और सामने आ रहे तमाम विडियो तक ही सिमट जाएगी। भौतिक साक्ष्य न होने की वजह से विवेचना की गुणवत्ता पर असर पड़ेगा। अब अगर न्यायिक जांच समिति घटना स्थल पर पहुंचती भी है तो उसके पास वहां से जुटाने के लिए कुछ भी नहीं होगा।


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