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संस्कृति संरक्षण के लिए असम में नए विभाग का ऐलान, जानिए 'असमिया' परंपरा और प्रचलित त्योहार

गुवाहाटी असमिया लोगों की परंपरा और संस्कृति के संरक्षण के लिए हिमंत बिस्व सरमा सरकार ने पहल की है। मंत्रिमंडल ने शनिवार को आदिवासियों और ...

गुवाहाटी असमिया लोगों की परंपरा और संस्कृति के संरक्षण के लिए हिमंत बिस्व सरमा सरकार ने पहल की है। मंत्रिमंडल ने शनिवार को आदिवासियों और अन्य मूल निवासी समुदायों के लोगों की आस्था और संस्कृति के संरक्षण के लिए नया विभाग सृजित करने का निर्णय लिया। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा ने यह जानकारी दी। सीएम हिमंत बिस्व सरमा ने बताया कि नया विभाग यह सुनिश्चित करेगा कि राज्य के मूल निवासियों को जरूरी सहयोग प्रदान करते हुए उनकी आस्था और परंपराओं का संरक्षण किया जाए। सीएम सरमा ने संवाददाता सम्मेलन में यह भी कहा कि मंत्रिमंडल ने बैठक के दौरान इस बात पर सहमति जताई गई कि लालफीताशाही खत्म करने और योजनाओं पर तेजी से अमल करने के लिए वित्तीय और प्रशासनिक सुधार जरूरी हैं। मुख्यमंत्री ने यह भी बताया कि विभाग प्रमुख दो करोड़ रुपये और इससे कम की लागत वाली परियोजनाओं की मंजूरी देने के हकदार होंगे। मुख्य सचिव की अध्यक्षता वाली एक वित्त समिति दो करोड़ से पांच करोड़ रुपये की लागत वाली परियोजनाओं को अनुमति देगी। असम में बोडो और अहोम का इतिहास ऐसा माना जाता है कि असम के सबसे पहले निवासी ऑस्ट्रिक नस्ल के थे। इन्हें प्रोटो-ऑस्ट्रोलायड कहा जाता है। संभवतः ऑस्ट्रेलिया और प्रशांत महासागर के कुछ अन्य द्वीपों से एशिया की धरती पर ये लोग बस गए। खासी और जयंतिया प्राचीन असम के प्रोटो-ऑस्ट्रोलायड के वंशज के तौर पर देखे जाते हैं। ऑस्ट्रिक के बाद मंगोलायड असम आए। मंगोलायड लोगों से बोडो जनजाति आई और ये शुरू में ही ब्रह्मपुत्र घाटी में आकर बस गए। वहीं कछारी, जिन्हें बोडो के रूप में जाना जाता था, वे भी कभी बहुत शक्तिशाली थे। ऐसा माना जाता है कि एक वक्त वे पूरे असम पर राज करते थे। 13वीं शताब्दी में अहोम आए तब कछारी और चुटिया पूर्वी असम के एक बड़े भाग पर शासन कर रहे थे। उसके बाद आर्य आए जो बहुत पहले ब्रह्मपुत्र घाटी में स्थापित हो गए। असम की आबादी में ये तीन श्रेणियां मोटे तौर पर, असम के निवासियों को तीन श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है, अर्थात जनजातीय जनसंख्या, गैर-जनजातीय जनसंख्या और अनुसूचित जातियां। जनजातीय समुदाय में जातीय-सांस्कृतिक समूह जैसे कछारी (बोडो), मिरि, देओरी, रभा, नागा, गारो, खासी आदि शामिल हैं। गैर-जनजातीय समूहों में अहोम, कायस्थ, कलिता, मोरन, मुत्तक, चुटिया आदि शामिल हैं। विस्थापित होकर असम में बसने वालों में ज्यादातर बंगाल, बांग्लादेश, बिहार, उत्तर प्रदेश,नेपाल और राजस्थान से थे। एक अन्य समूह बगनिया के नाम से जाना जाता था, जिन्हें ब्रिटिश शासन में चाय उत्पादकों द्वारा बंगाल, बिहार, ओडिशा, और मध्य प्रदेश से लाया गया था। असम मेलों और त्योहारों की धरती है। असमिया परंपरा के प्रचलित त्योहार असम में मनाए जाने वाले ज्यादातर त्योहारों का मूल इसके निवासियों के तमाम मतों और मान्यताओं में है। ये त्योहार असम के लोगों की सच्ची भावना, परंपरा और जीवनशैली को दर्शाते हैं। असम में मनाए जाने वाले त्योहारों में बिहु-भोगली या माघ बिहु (जनवरी), रोंगाली या बोहग बिहु (अप्रैल) और कोंगाली या कति बिहु (मई) में होता है। अप्रैल के मध्य में बोडो और कछारी लोग बैशागु मनाते हैं। मिशिंग जनताति के लोग फरवरी-मार्च में आली-आई-लिगांग मनाते हैं। बसंत के मौसम में रभा जनजाति के लोग बाइखो जबकि कार्बी लोग अप्रैल में रोंगकेर त्योहार मनाते हैं। वहीं दिमसा जनजाति के लोग रजिनी गबरा और हरनी गबरा मनाते हैं। इसके अलावा मशहूर कामाख्या मंदिर में अंबुबाशी मेला हर साल जून के मध्य में मनाया जाता है।


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