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यह सिस्टम है जनाब... दूसरे विश्व युद्ध में पैर गंवाया, 97 के योद्धा को अब जाकर मिला पेंशन का हक

झुंझनूं। देश की सरहद पर दुश्मनों के छक्के छुड़ाने वाले सैनिक जब कुछ ठान लेते हैं, तो उसे पूरा ही करके छोड़ते हैं। कुछ ऐसा ही एक बार फिर र...

झुंझनूं। देश की सरहद पर दुश्मनों के छक्के छुड़ाने वाले सैनिक जब कुछ ठान लेते हैं, तो उसे पूरा ही करके छोड़ते हैं। कुछ ऐसा ही एक बार फिर राजस्थान के झुंझुनू के 97 वर्षीय वयोवृद्ध सैनिक बलवंत सिंह ने कर दिखाया है। उल्लेखनीय है कि पिछले पांच दशकों से अपनी पेंशन का इंतजार कर रहे बलवंत सिंह ने अपनी व्यक्तिगत लंबी लड़ाई की जंग को जीत लिया है। सैन्य न्यायाधिकरण ने उन्हें सरकार की युद्ध विकलांगता पेंशन की अनुमति दी है। आपको बता दें कि द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जाबांज सैनिक बलवंत सिंह ने 15 दिसंबर, 1944 को इटली में मित्र देशों की सेना के लिए भारतीय दल के साथ लड़ते हुए अपना एक पैर गवां दिया था। दरअसल युद्ध के दौरान एक बारूदी सुरंग विस्फोट होने के चलते उन्होंने अपना बायां पैर खो दिया। इसके बाद दो साल इसी वजह से उन्हें सेना सेवा से बाहर कर दिया गया, लेकिन दुखद ये रहा है कि अपना पैर गंवाने के बाद भी उन्हें कई सालों तक अपनी पेंशन का इंतजार करना पड़ा और आखिरकार उनके परिवार और खुद के हौंसलों से आज उन्होंने सिस्टम से लड़कर पेंशन प्राप्त करने की जंग भी जीत ली। इन समस्याओं के चलते नहीं मिल रही थी पेंशन उल्लेखनीय है कि सिंह 1943 में 3/1 पंजाब रेजिमेंट में शामिल हुए । इसके बाद द्वितीय विश्व युद्ध से लौटने के बाद राजपूताना राइफल्स में स्थानांतरित हो गए। उन्होंने एक पेंशन के लिए आवेदन किया था, जिसे सरकार ने 1972 में शुरू किया था। दरअसल बलवंत के कानूनी वकील कर्नल एसबी सिंह (सेवानिवृत्त) ने बताया, "सरकार ने युद्ध विकलांगता पेंशन का प्रावधान किया है, जो कि 1947 के बाद यानी आजादी के बाद की लड़ाई में घायल हुए लोगों और दुनिया में लड़ने वाले भारतीय सैनिकों को दिए जाने वाले अंतिम वेतन का 100% है। बलवंत सिंह की विकलांगता 100% है क्योंकि उन्होंने अपना बायां पैर खो दिया था। लेकिन चूंकि एएफटी में कोई न्यायाधीश नहीं है, इसलिए मामला लंबित रहा। वहीं जिन सैनिकों ने अपने अंग खो दिए थे । साथ ही जो द्वितीय विश्व युद्धों में जीवन भर के लिए अपंग हो गए थे, उन्हें इस सेवानिवृत्ति योजना से बाहर रखा गया था। हालांकि अकेले WWII में 2.5 मिलियन से अधिक भारतीय लड़े। लेकिन प्रावधान ना होने के चलते भी उन्हें परेशानी झेलनी पड़ी, लेकिन कानूनी रूप से पेंशन के हकदार होने के चलते उन्हें अब न्याय मिल गया है। लखनऊ एएफटी में भी सामने आया था मामला सामान्य विकलांगता पेंशन सामान्य से सिर्फ 30% है । पेंशन, लेकिन उन्हें युद्ध विकलांगता पेंशन दी जानी चाहिए जैसा कि गढ़वाल के एक सैनिक के मामले में लखनऊ एएफटी द्वारा किया गया था।" युद्ध के दिग्गज ने तीन साल, दो महीने और 16 की सेवा के बाद 11 मई, 1946 को सेवा छोड़ दी। बुजुर्ग के पक्ष में सुनाया फैसला उल्लेखनीय है कि सशस्त्र बल न्यायाधिकरण की नई दिल्ली खंडपीठ ने इस मामले को अपनी जयपुर इकाई को दिया था। यह ईकाई 2010 से इसकी सुनवाई कर रही थी । साथ ही न्यायाधिकरण की इस ईकाई ने गैर-सैनिक के पक्ष में मंगलवार को फैसला सुना दिया। चेन्नई के एक प्रशासनिक सदस्य ने कहा कि सिंह को बकाया के साथ 2008 से 100% पेंशन मिलेगी, जो कि मामला दर्ज करने से तीन साल पहले की है। सिंह के वकील कर्नल (सेवानिवृत्त) एस बी सिंह ने कहा कि द्वितीय विश्व युद्ध के दिग्गज और उनका परिवार इस खबर से खुश हैं। “बलवंत सिंह की विकलांगता 100% है क्योंकि उन्होंने अपना बायां पैर खो दिया था। हमें खुशी है कि उन्हें न्याय मिल रहा है। बेटे ने भी जताई खुशी सिंह ने स्वतंत्रता पूर्व भारतीय सेना में तीन साल, दो महीने और 16 दिन पहले सेवा की थी। इससे पहले कि वह एक पैर खोने के लिए समय से पहले सेवानिवृत्त हो गए। उनके बेटे सुभाष सिंह ने कहा कि वह ट्रिब्यूनल के फैसले से खुश हैं, लेकिन परिवार बेहतर कर सकता था, अगर राज्य मदद के लिए आगे आता। “हम एक गांव में रहते हैं और युद्ध में घायलों के लिए पेंशन के बारे में कुछ नहीं जानते थे। हमें इसके बारे में कारगिल युद्ध (1999) के बाद ही पता चला।


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