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महाराष्ट्र पुलिस में नया ट्रेंड, अफसरों के खिलाफ IPS करा रहे हैं FIR

मुंबई: एल टी. मार्ग पुलिस स्टेशन के तीन अधिकारियों ने पिछले महीने आंगड़िया के बिजनेस से जुड़े कुछ लोगों से 15 लाख रुपये की उगाही की। इस क...

मुंबई: एल टी. मार्ग पुलिस स्टेशन के तीन अधिकारियों ने पिछले महीने आंगड़िया के बिजनेस से जुड़े कुछ लोगों से 15 लाख रुपये की उगाही की। इस केस में दो पुलिस इंस्पेक्टर गिरफ्तार हुए। एक इंस्पेक्टर को कोर्ट से अंतरिम राहत मिल गई। खुद इस जोन के डीसीपी डॉ़ सौरभ त्रिपाठी भी जांच के घेरे में हैं। उनका उस जोन से ट्रांसफर भी किया जा चुका है। लेकिन सूत्रों के अनुसार, मुंबई के नए सीपी संजय पांडे() ने सवाल किया है कि एफआईआर में डीसीपी का नाम क्यों नहीं है? कायदे से एफआईआर किसे करनी चाहिए? आंगड़िया के बिजनेस जुड़े उन लोगों को, जिन्हें लूटा गया, लेकिन इस केस में एफआईआर(FIR) की खुद इस रीजन के अडिशनल सीपी आईपीएस(IPS Officer) अधिकारी दिलीप सावंत ने। दूसरा केस पिछले सप्ताह का है। अडिशनल डीजी आईपीएस अधिकारी रश्मि शुक्ला पर आरोप है कि उन्होंने बतौर एसआईडी चीफ संजय राउत और एकनाथ खडसे जैसे नेताओं के अवैध रूप से फोन टेप किए। कायदे से एफआईआर किसे करनी चाहिए? संजय राउत और एकनाथ खडसे में से किसी को या दोनों को, लेकिन कोलाबा पुलिस स्टेशन में एफआईआर दर्ज कराई एसबी वन के अडिशनल सीपी राजीव जैन ने, जो खुद आईपीएस अधिकारी हैं। खास बात यह है कि जो पुलिस वाले कंप्लेनेंट हैं, वह केस की जांच नहीं कर रहे हैं। जांच किसी और यूनिट को दी गई है, जो एफआईआर दर्ज करने वाले आईपीएस अधिकारियों के ज्यूरिडिक्शन के बाहर हैं। यानी वहां केस का सुपरविजन अधिकारी कोई और आईपीएस है। जैसे आंगड़िया वाले केस की जांच सीआईयू के एसीपी शशांक सांडभोर को ट्रांसफर की गई है। सीआईयू मुंबई क्राइम ब्रांच के अंडर में आती है, जिसके चीफ मिलिंद भारंबे हैं। रश्मि शुक्ला वाला केस भी कोलाबा पुलिस स्टेशन से क्राइम ब्रांच को ट्रांसफर किया जा रहा है। मुंबई पुलिस के एक अधिकारी ने एनबीटी से माना कि अमूमन पुलिस वालों के खिलाफ खुद पुलिस वाले कंप्लेनेंट नहीं होते हैं। खासतौर पर आईपीएस तो बिलकुल भी नहीं। इस अधिकारी के अनुसार, रश्मि शुक्ला मामले में यदि मान भी लिया जाए, कि विभागीय स्तर पर गड़बड़ हुई, इसलिए पुलिस अधिकारी ने एफआईआर दर्ज की, लेकिन आंगडिया वाले केस में अडिशनल सीपी रैंक के अधिकारी को शिकायतकर्ता बनाया जाना, निश्चित ही नया ट्रेंड है। रिटायर्ड आईजी राजेश पांडे ने एनबीटी से कहा कि कई बार कोई पीड़ित यदि पुलिस कमिश्नर से शिकायत करता है, तो अमूमन पुलिस कमिश्नर उस पुलिस अधिकारी को उस शिकायत की जांच करने को देता है, जिसकी विश्वसनीयता पर किसी को शक न हो। जांच करने वाला वह अधिकारी जब अपनी जांच रिपोर्ट पुलिस कमिश्नर को सौंपता है, तो कई बार पुलिस कमिश्नर उस जांच रिपोर्ट पर ही एफआईआर दर्ज करने को कहता है, इसलिए जिसने प्रारंभ में जांच की, उसके नाम से एफआईआर दर्ज हो जाती है। लेकिन एफआईआर दर्ज करने के बाद विवेचना अधिकारी किसी और को बनाया जाता है। आरोपी पुलिसवालों का बचना मुश्किलराजेश पांडे कहते हैं कि आईपीएस अधिकारी के किसी और आईपीएस अधिकारी के खिलाफ कंप्लेनेंट बनने का बड़ा इम्पैक्ट यह होता है कि मुकदमे के दौरान एफआईआर दर्ज कराने वाला आईपीएस कभी मुकरेगा नहीं। दूसरा, आईपीएस अधिकारी के कंप्लेनेंट बनने से एफआईआर के बाद विवेचना करने वाले अधिकारी पर आरोपी पुलिस अधिकारी द्वारा दाएं-बाएं कहीं से दबाव नहीं डलवाया जा सकता। इसलिए जिन पुलिस अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर हुई है या जो बिना एफआईआर के भी जांच के घेरे में हैं, उनकी मुसीबतें आने वाले दिनों में बहुत बढ़ने वाली हैं।


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